परम् सत्य पूर्णतया पारलौकिक स्वत:
अस्तित्व है । गुणयुक्त प्रकृति बंधनकारी है । मनुष्य जो कि प्रकृतीय रचना है परम्
सत्य के अंश आत्मा से युक्त है । आत्मा प्रकृतीय गुणों की भोक्ता होती है । इसलिये
अज्ञानवश प्रकृतीय गुणों में मोंह जनित कर लेती है । सत्य स्थिति का ज्ञान ना होना
अज्ञान है । सत्य स्थिति के अनुसार आत्मा समस्त कर्मों का प्रेरक है जबकि समस्त
कर्मों की कर्ता प्रकृति है । इस सत्य को जानना । इस सत्य की मर्यादा में जीवन
जीना । ज्ञान के प्रकाश में जीवन जीना है । इस सत्य के विपरीत अपने में कर्तापन का
अहंकार करना । अपने को कर्ता मानते हुये अपनी इच्छा के कर्मों को करना । अज्ञान के
अंधकार में जीवन जीना है । अज्ञान प्रवृत्त करता है बंधन । ज्ञान प्रवृत्त करता है
मुक्ति ।
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