मनुष्य के मस्तिष्क में प्रकृतीय
रचना और विज्ञान के प्रभाव द्वारा सात्विक और तामसिक दोनो ही प्रकार के विचार भाव
सृजित होते हैं । इनमें से हितोपियोगी विचारभाव को जानना, कलुषित भ्रमात्मक विचारभाव से
मुक्ति पाना, ही जीवन की सफलता है । परम् सत्य के अंश आत्मा का
अनुभव पाना, आत्मा की गरिमा के अनुरूप जीवन जीना ही सार्थकता है
। दिव्य जन्म है । समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है और प्रेरक स्वयं परम् सत्य
हैं । इस विचार भाव को ग्रहण कर किये जाने वाले कर्म दिव्य कर्म होते हैं । दिव्य
जन्म होने पर दिव्य कर्म को करने वाली आत्मा का परम् सत्य में विलय हो जाता है ।
क्योंकि पुनर्जन्म तो मोहाशक्त आत्मा का होता है । मानो प्रकृति मोहाशक्त आत्मा को
मोंह से मुक्त होने के लिये बार बार अवसर देती
है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें