आम जीवन का अभ्यास इच्छाजनित कर्मों को करने का है । इसलिये
उपरोक्त वृतांत सहसा विश्वसनीय नहीं प्रतीत होगा । परंतु उपरोक्त वृतांत इतना सत्य
है जितना की सूर्य का प्रकाश । यह बात सिद्धांतरूप में समझकर जीवन में इसका सत्य
अनुभव स्वयँ करें तो अधिक सार्थक परिणाम प्रगट होगा । प्रकृति की अपेक्षा ही हमारा
कर्तब्य है । यह इच्छाओं के विद्यमान रहते प्रगट नहीं होता है । इच्छाओं के शून्य
होने पर इसका स्वच्छ स्वरूप विदित होगा ।
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