कर्म करने की सवतंत्रता है । कर्म
फल में लिप्सा वर्जित है । मुक्ति और बंधन का विशाल भेद इसी उपरोक्त दो तथ्यों में
निहित है । प्रकृति का संसार हर प्रत्येक प्रकार के कर्मों को सम्मुख किये हुये है
। सभी कर्मों को मनुष्य ही कर रहा है । कोई कर्म हेय नहीं है । प्रकृति ने किस
व्यक्ति को किस कर्म के लिये बनाया है यह प्रकृति ही जानती है । यदि हम प्रकृति की
अपेक्षानुसार कर्म कर रहे हैं तो उस कर्म में मेरा कर्तापन तो है नही । हमतो मात्र
एक यंत्र रूप में उसे कर रहे हैं । इसलिये उस कर्म के अच्छे बुरे के साथ मेरा नाम
सम्बद्ध करना औचित्यपूर्ण नहीं होगा । यही स्वरूप चरितार्थ करना अपेक्षित होता है
। यही मुक्ति है । उस कर्म के कर्तापन में सम्मलित ना हुआ जाय । कर्ता तो प्रकृति
है । हमतो मात्र उस प्रकृति के एक यंत्र हैं । जब प्रकृति जैसा करा रही है हम कर
रहे हैं ।
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