जीवन के सत्य को जानना । अपने अंदर
विद्यमान उस परम् सत्य की छाया को जानना । यह दोनो ही एक दूसरे के पर्याय हैं । इस
सत्य को जानने के लिये भक्ति और कर्म दो मार्ग है । ना ही भक्ति और ना ही कर्म कोई
भी सत्य का रूप बोध नहीं हैं । यह दोनो ही साधन मात्र हैं । उस परम् सत्य को जानने
के लिये । उसका ज्ञान हो जाने पर भी कर्म व्यक्ति करेगा । परंतु कर्म को दायित्व
के रूप में नहीं करेगा बल्कि कर्म उसकी पहचान होगा । कर्म करने के लिये तो जन्म ही
हुआ है । कर्म करने का निमित्त निर्धारित करता है कि कर्म बंधन को प्रशस्थ करने
वाला है कि मुक्ति को । ज्ञानी का कर्म इच्छा की पूर्ति का नहीं अपितु कर्म के
यंत्र के द्वारा किया हुआ कर्म होता है । ज्ञानी का कर्म साधना नहीं लक्षणा होता
है ।
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