वह संत पुरुष जिसकी समस्त इच्छायें
समाप्त हो चुकी हैं उसका इच्छागत कर्तब्य दायित्व समाप्त हो जाता है । ऐसा संत
अपने जीवनकाल पर्यंत कार्य तो करेगा परंतु उसका कोई कर्तब्य दायित्व नहीं होगा ।
उसका समस्त कार्य परम् सत्य की कर्म प्रेरणा द्वारा उसकी सेवा में होगा । इस स्थल
पर ज्ञातब्य है कि कोई भी व्यक्ति जिसभी कर्म को अपना कर्तब्य दायित्व बताता है वह
उसकी अपनी इच्छाओं की पूर्ति में ही होता है । जिस संत की इच्छायें नियंत्रित हो
गई उसका समस्त कार्य परम् सत्य की सेवा में उसी द्वारा पैदा की गई प्रेरणा द्वारा होता
है । यह एकाकी की अनंत में पूर्ण समर्पण की स्थिति होती है । इसका उद्देष्य परम्
सत्य के प्रयोजन में अपने को अर्पित करना है । इस स्थिति के संत के किसी कर्म में
किसी दोष की सम्भावना शेस नहीं रह जाती है । कर्म बंधनकारी नहीं रह जाता है ।
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