मनुष्य के प्रगति की सीमा परिभाषित
की जाती है आनंद द्वारा । मनुष्य विज्ञान से उन्नति कर आनंद को पाता है । यह
स्थिति मोंह से मुक्त होने के उपरांत ही प्राप्त हो सकती है । मुक्त आत्मा ब्रम्ह
नहीं होती परंतु ब्रम्ह की अनुभूति से आनंद की स्थिति में होती है । आत्मा इस
पंचतत्व की शरीर से भिन्न अस्तित्व है । इसकी अनुभूति प्रेरित करती है मुक्ति ।
मुक्त मिलने पर मिलता है आनंद । यही सर्वोच्च शिखर होता है प्रगति का । इसे पाना
ही चर्मोत्कर्ष उपलब्धि है ।
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