कर्म प्रेरणा का श्रोत - इच्छा का पूर्णमर्दन एक ऐसे शांत सरल शून्य स्थिति को सृजित करने वाला होता
है जिसमें कर्ता व्यक्ति का कोई कर्म दायित्व शेस नहीं रह जाता है । ऐसे संत को
कोई कर्म करने की कोई अभिलाषा शेस नहीं रह जाती है और ना ही किसी फल को पाने की
कोई आकाँक्षा ही रह जावेगी । ऐसा कर्मयोगी उस परम् सत्य में समाहित जीवन जीता है ।
उसका अपना अलग कोई अस्तित्व नहीं शेस रह जाता है । वह पूर्णरूप से उस परम् सत्य का
प्रतिनिधि बनकर समस्त कर्म करता है । उसका कोई भी कर्म उसका अपना नहीं होता अपितु
वह परम् सत्य के आदेश को कर्म में रूपांतरित करता है । यह स्वरूप अपने को पूर्णरूप
से परम् सत्य को अर्पित करना है । पूर्णसमर्पण । पूर्णविलय । चरमोत्कर्ष सरलता ।
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