कर्मों को करते हुये कर्मों के
बंधन से मुक्त हुआ जा सकता है । इसके लिये अपने दायित्व के कर्मों को करते समय
पूर्ण समर्पण के साथ पूर्ण निष्ठा से बिना कर्म फल के साथ कोई मानसिक संकल्प
धारणकिये हुये कर्म किया जाय । कर्म प्रकृति द्वारा अपेक्षित और आदेशित होना
चाहिये । उपरोक्त समस्त उपलब्धि मस्तिष्क के संयमित आचरण से ही सम्भव हो सकती हैं
।
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