यदि कंचिद हमारी शरीर, इंद्रियाँ, विवेक, मस्तिष्क एक यंत्र के रूप में कर्ता प्रकृति के
कर्मों को करने वाले बनजाते हैं तो अभीष्ट स्थिति को प्राप्त हो जाते हैं । परम्
सत्य की अपेक्षा के अनुरूप । अनंतकाल से हम सभी परिणाम की भ्रमात्मक अपेक्षा के पीछे
अपनी समस्त ऊर्जा व्यय करते आये हैं । इस भ्रम से उबरना ही लक्ष्य की प्राप्ति
होगी । एक कर्म के परिणाम से दूसरे नये कर्म का उदय होता ही जावेगा । इसका कहीं
अंत नहीं है । जिस पल इस भ्रम को पहचान जायेंगे और अपने को परम् सत्य के प्रयोजन
की पूर्ति का यंत्र बना देंगे तत्काल ही मुक्त हो जावेंगे । कार्य के परिणाम की
कोई रूचि नहीं रह जावेगी । प्रेरक भी वही है । प्रयोजन भी उसी का है । हमको परिणाम
से क्या काम । हमतो मात्र सेवक हैं । सेवा मेरा धर्म है । अपेक्षित दायित्व
निर्वाह ही सम्पूर्ण लक्ष्य है । इस स्थिति को पाने के लिये केवल त्यागना है स्वयँ
की इच्छाओं को । अपने को उस परम् सत्य के प्रयोजन का यंत्र बना देना ही लक्ष्य
करना योग्य प्रयत्न है ।
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