परम् सत्य की खोज़ की ज्ञान पर
आधारित विधा तथा परम् सत्य का वास्तविक अनुभव पाना दोनों
को ही ज्ञान शब्द द्वारा व्यक्त किया जाता है । सेवा समर्पण ज्ञान के वास्तविक
अनुभव के श्रोत नहीं हैं । अधिक से अधिक यह ज्ञान पाने के निमित्त हैं । विज्ञान
के अर्धसत्य तथा आध्यात्मिक पूर्णसत्य में बहुत भिन्नता है । फिरभी विज्ञान के
सत्य की खोज़ को आगे बढाने पर पूर्णसत्य की खोज़ का पथ प्रशस्थ होता है । विज्ञान
मस्तिष्क पर आच्छादित प्रगति में बाधक दु:वृत्तियों का नाशकर मस्तिष्क को वह
क्षमता प्रदान करता है जिससे वह अपनी वर्तमान ग्राह्यता को पारकर उसलोक के ज्ञान
को ग्रहण करने में सक्षम बनता है जहाँ वर्तमान में उसकी ग्राह्यता नहीं है ।
इसलिये आध्यात्मिक सत्य की खोज़ को वैज्ञानिक सत्य की खोज़ के क्रममें आगे की खोज़ के
रूप में ग्रहण किया जाना योग्य विचार है । विज्ञान मस्तिष्क को क्रमिक प्रगति के
पथपर अग्रसर करता है । परम् सत्य का वास्तविक अनुभव पाने के लिये सुझाये हये पथ
नामत: ज्ञानपथ कर्मपथ भक्तिपथ भी आत्मा का क्रमिक विकास करते हुये ज्ञान के
वास्तविक अनुभव तक पहुँचने का अवसर प्रदान करते हैं । आत्मा प्रकृतीय मोंह के
आच्छादन के प्रभाव से अज्ञान के अंधकार से ग्रसित होता है । उसे ज्ञान के सूर्य के
प्रकाश तक क्रमबद्ध प्रगति द्वारा ही पहुँचाया जा सकता है । आध्यात्मिक दृष्टि का
विकसित होना भी उतना ही आवश्यक होता है ।
बुधवार, 30 अप्रैल 2014
मंगलवार, 29 अप्रैल 2014
दिव्य रूप
परम् सत्य को पाने के लिये जो साधक जिस मार्ग से प्रयत्नशील
होता है उसे उसी की साधना के अनुरूप रूप में परम् सत्य उसे मिलता है । ज्ञान के
रूप में पाने के प्रयत्नशील साधक को परम् सत्य चमकते हुये सूर्य के रूप में
उज्ज्वल ज्ञान के स्वरूप में मिलता है जिसमें अंधकार का कंचिद कोई रंचमात्र स्थान
नहीं होता है । जो साधक उस परम् सत्य को सत् कर्मों के द्वारा पाने को प्रयत्नशील
होता है उसे वह परम् सत्य शाश्वत् दृढ समदर्शी पवित्रता के रूप में मिलता है । जो
भावुक साधक उस परम् सत्य को प्रेम व भक्ति के पथ से पाने को प्रयत्नशील होता है
उसे वह प्रेम व करुणा की शाश्वत् कोमलता के रूप में मिलता है । इस प्रकार परम्
सत्य अपने में इन विभिन्न स्वरूपों को संजोये हुये है । साधक को उसके समंवित स्वरूप
में उसे पाने के लिये लक्ष्य करना होता है । धारणा इच्छा और विचार ये तीन मानसिक
अवस्थायें हैं जिनका व्यवहारिक जीवन में अलग अलग रूप नहीं कायम किया जा सकता है ।
यह तीनों ही एक ही सत्य की तीन अवस्थाये हैं ।
सोमवार, 28 अप्रैल 2014
सत् चित आनंद
परम् सत्य को बताया गया है सत् चित आनंद । सत् – वास्तविक । चित – सत्य । आनंद – आनंदमय । ब्रम्ह
का अनुभव प्राप्त होगा जो कि वास्तविक अनुभव होगा । इसके विपरीत होता है भ्रामक
अनुभव । जो कि प्रतीत होता है परंतु वास्तविकता में उस स्वरूप में होता नहीं है ।
प्रकृतीय मोंह से मिलने वाला सुख । यह सत् नहीं होता । प्रारम्भ में प्रतीत होता
है कि यह सुख है । परंतु अंत में वह दु:ख का कारण बनता है । इसके विपरीत ब्रम्ह के
दर्शन से मिलने वाला सुख वास्तविक सुख होता है । समय के व्यतीत होने परभी वह सुख
ही रहेगा । परम् सत्य को लक्ष्य कर प्रयत्नशील जिज्ञासुओं के सज्ञान के लिये यह
लक्षण बताये गये हैं । इन लक्षणों से तुलना करके प्रयत्नशील साधक को अपने
प्रयत्नों की सार्थकता को परीक्षित करना होगा । परम् सत्य का जो अनुभव प्राप्त होगा
वह वास्तविक अनुभव होगा, समय के साथ
परिवर्तित होने वाला नहीं होगा, और प्रत्येक रूप
में वह आनंदमय होगा ।
रविवार, 27 अप्रैल 2014
पूर्णता का लक्ष्य
जीवन में पूर्णता का लक्ष्य । मनुष्य में विद्यमान परम्
सत्य की छाया का दर्शन । परम् सत्य की गरिमा के अनुकूल आचरण । आच्छादित अविद्या का
शमन यह सभी एक ही स्थिति को अलग अलग ढंग से व्यक्त करना है । इस स्थिति को पाने के
तीन मार्ग बताये जाते हैं । प्रथम – परम् सत्य के
ज्ञान द्वारा । द्वितीय – परम् सत्य व उसकी
रचना प्रकृति के प्रति प्रेम व समर्पण द्वारा । तीसरा – अपनी समस्त इच्छाओं को प्रभु के प्रयोजन के लिये अर्पित करने के द्वारा ।
वास्तविकता में उपरोक्त तीनो विभाजन मनुष्य में पायी जाने वाली तीन भिन्न प्रकार
की प्रकृति के अनुरूप सुझाया गया है । यथा सैद्धांतिक ग्राह्यता जिनकी प्रधान
पहचान है उनके लिये ज्ञान-पथ सुगम बताया गया । जिनमें भावुकता प्रधान पहचान है
उनके लिये भक्ति अर्थात प्रेम व समर्पण का पथ सुगम बताया गया । जिनमें व्यवहारिक
कर्म जगत की प्रचलित मान्यताये प्रधान पहचान है उनके लिये कर्म पथ को सुगम बताया
गया है । लक्ष्य एक ही होता है । अविद्या का नाश । फलत: जाग्रित होने वाला ज्ञान ।
इस ज्ञान की ज्योति से विकसित होने वाला व्यापक व्यक्तित्व । शांत दिव्य ब्रम्ह की
गरिमा का जीवन ।
शनिवार, 26 अप्रैल 2014
परम् सत्य से साक्षात्
अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया का सीधा सक्षात्
अनुभव पाने के लिये मात्र बाधक प्रवृत्तियों को हटाने की आवश्यकता है । अविद्या के
आच्छादन को हटाने मात्र से अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया का दर्शन मिलेगा
। इसके लिये किसी नयी तलाश की आवश्यकता नहीं होती । अद्वैत वेदांत व्यक्त करता है
कि यह परम् सत्य हमारे अंदर सदैव विद्यमान रहता है । इसे कहीं तलाशना नहीं है ।
मात्र हमारी अस्थिर धारणायें और हमारी इच्छायें इस परम् सत्य को आच्छादित किये
हुये रहती हैं । परिणामत: हम इस परम् सत्य के दर्शन से च्युत रहते हैं । मस्तिष्क
की पूर्ण शांति की स्थिति और इच्छाओं का पूर्णदमन तथा अहंकार का पूर्ण मर्दन होने
पर परम् सत्य के साक्षात् दर्शन अविलम्ब होंगे । यह वह प्रकाश श्रोत है जिससे हमारे
जीवन का वास्तविक स्वरूप प्रगट होगा । इस प्रकाश पुँज से जीवन का वह दिव्य स्वरूप
प्रगट होगा जो स्नेह व सौहार्द का प्रतीक होगा ।
परम् सत्य के दर्शन और अविद्या के आच्छादन के परिणाम से
व्याप्त अज्ञान दोनों एक दूसरे के विरोधी प्रकाश और अंधकार की भाँति होते हैं ।
परम्ब सत्य के दर्शन से ज्ञान का सूर्य उदय होगा और अज्ञान का अंधकार पूर्णरूप से
विलीन हो जायेगा । अविद्या से आच्छादित आत्मा पूर्णरूप से मुक्त हो जायेगी । मुक्त
आत्मा पूरे भ्रमलोक पर विजय कर लेगी । इस विजय के लिये किसी युद्ध को नहीं लडना है
। इसके लिये किसी बाह्य शक्ति का शमन या किसी नयी उत्पत्ति का निर्माण नहीं करना
है । ऐसी स्थिति मिलजाने पर कर्म बंधनकारी नहीं रह जावेंगे । जब हम इस सत्य के
दर्शन पायेगे तो हमारा जीवन ही ब्रम्ह के जीवन के स्वरूप हो जावेगा । यही जीवन का
आदर्श स्वरूप होगा ।
शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014
अविद्या से मुक्ति
अविद्या से मुक्ति पाने के लिये परम सत्य की जो छवि प्रकृति
के मध्यरहकर प्रकृतीय मोंह से आच्छादित हो गई है उसे स्वच्छ करना होगा । परम् सत्य
की चेतना की स्थिर ज्योति जगानी होगी । मस्तिष्क की अस्थिरता, सतत् परिवर्तित होती धारणाओं पर विजय करना होगा । मस्तिष्क के अंदर जो द्वंद
प्रकृतीय मोंह तथा परम् सत्य की चेतना के मध्य चलरहा होता हैं उसपर पूर्ण अंकुश
करना होगा और मस्तिष्क को परम् सत्य की चेतना में स्थिर करना होगा ।
इंद्रीय गुणों के भोग की वासना को अंकुश करना होगा । मस्तिष्क में उठने वाले
इच्छाओं के वेग को नियंत्रित करना होगा । समस्त विकार मस्तिष्क में ही जन्म लेते
हैं । इसीलिये सर्वाधिक सुधार मस्तिष्क की ही दशा सुधार में ही अपेक्षित होते हैं
। मस्तिष्क में तर्कों द्वारा उत्पन्न होने वाली अस्थिरता को पूर्णरूप से विश्वास
द्वारा विजित करना होगा । विवेक को परम् सत्य के प्रति निष्ठावान बनाना होगा ।
परम् सत्य हमारे अंदर विद्यमान होते हुये भी अविद्या के
आच्छादन के कारण लुप्त दशा को प्राप्त होता है । आच्छादन समाप्त होने पर परम् सत्य
की चेतना की ज्योति हमारे व्यक्तित्व को प्रकाशित करेगी । हम प्रकृतीय मोंह की जेल
से मुक्त होकर दिव्य आनंद के व्यापक व्यक्तित्व की अनुभूति करेगें । परम् सत्य की
सतत् अनुभूति ही ज्ञान है । ज्ञान का सूर्य उदय होने पर अविद्या का अंधकार विलीन
हो जावेगा । लिप्सा व मोंह विनष्ट होगा ।
गुरुवार, 24 अप्रैल 2014
अविद्या आध्यात्मिक अंधता
अविद्या कोई मानसिक स्तर की त्रुटि नहीं होती । अविद्या
आध्यात्मिक अंधता है । अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य के अंश आत्मा की अनुभूति का
ना होना । परम् सत्य की चिर दिव्य आनंदमय स्वरूप की अनुभूति ही मनुष्य का वास्तविक
परिचय होता है । इस अनुभूति के प्रभाव से ही उसके चरित्र में समस्त सुंदर गुण
प्रगट होते हैं । इस अनुभूति के क्षीण होने की दशा में मनुष्य में प्रगट होती है
अविद्या । अविद्या के प्रगट होने पर सृजित होती हैं इच्छायें । इच्छाओं के उत्पन्न
होने पर वह करता है फल की कामना से कार्य । इस प्रकार दो अलग अलग चक्र प्रवृत्त
होते हैं । दोनों ही चक्र मनुष्य ही सम्पादित करता है । एक चक्र बंधनकारी होता है । दूसरा मुक्तिदायक होता है । यह अंतर
उत्पन्न होता है अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य के अंश आत्मा की अनुभूति करते हुये
जीवनजीने में अथवा आत्मा की उपस्थिति से अचेत जीवनयापन करने में ।
धर्मदर्शन अनुशंसा करता है कि अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य
के अंश की अनुभूति करते हुये, उस परम् सत्य की
गरिमा के अनुसार जीवन जीने हेतु । दशा जिसमें मनुष्य इस अनुभूति को नहीं अनुभव कर
पाता है अविद्या कहा गया । यह अंधता उसे प्रवृत्त करती है भ्रमात्मक प्रकृतीय मोंह
की ओर । यह प्रकृतीय मोंह उसे दु:खभोग के दुश्चक्र में डालता है ।
योगशास्त्र बताता है वह विधायें जिनके द्वारा अविद्या का
नाश होता है । वह विधायें जिनके द्वारा मनुष्य को प्रतिपल स्मरण बना रहता है उस
परम् सत्य की अपने अंत:करण में उपस्थित होने की । ऐसी दशा में ही मनुष्य परम् सत्य
की गरिमा के अनुरूप जीवनजीता है । परम् सत्य की उपस्थिति प्रत्येक प्राणी में
अनुभव करता है । शाश्वत परम् सत्य की निरंकार छवि के अनुरूप जीवनजीता है । परम्
सत्य अपने को ऐसे ही मनुष्यों के जीवन में प्रगट करता है ।
बुधवार, 23 अप्रैल 2014
अविद्या ही बंधनकारी
अविद्या वस्तु की सत्य प्रकृति के प्रति अनभिज्ञता को कहा
जाता है । एक भ्रांतिपूर्ण धारणा कि मनुष्य आत्मनिर्भर है । मनुष्य वास्तविकता है
और स्थायी है कि भूलपूर्ण धारणा अविद्या है । यह अविद्या जन्म देती है इच्छाओं को
। इच्छाओं का पीछा करते हुये मनुष्य सदैव इस संसार में आवागमनके चक्र में चलता ही
रहेगा । इससे कभी भी मुक्ति नहीं पा सकेगा । इच्छाओं का पीछा करते हुये चाहे वह
सत्कर्म पुण्य दान करे अथवा तामस की पूर्ति करे दोनों ही बंधनकारी हैं ।
सत्य स्थिति का बोध होना ज्ञान है । ज्ञान अविद्या का नाश
करने वाला होता है । अविद्या समाप्त होने पर इच्छाये विश्राम पाती हैं । इच्छाओं
से मुक्त होने पर कर्म दोष समाप्त होते हैं । इच्छाओं का निदान अधिक इच्छाओं द्वारा
नहीं किया जा सकता । कर्म दोष का निवारण और अधिक दोषपूर्ण कर्मद्वारा नहीं किया जा
सकता है । शाश्वत् सत्य को परिवर्तनशील अस्तित्व द्वारा नहीं पाया जा सकता ।
अविद्या का नाश होने पर ही इच्छाओं से मुक्ति मिलेगी ।
इच्छाओं का नाश होने पर ही फल की कामना से किये जाने वाले कर्म से मुक्ति मिलेगी ।
विद्या ही उपाय है अविद्या से मुक्ति का – इच्छा – कर्म फल की कामना से किये जाने वाले कर्म का । बंधन से मुक्ति का ।
मंगलवार, 22 अप्रैल 2014
परिवर्तन से परे
परम् सत्य पूर्णरूप से अपरिवर्तनशील है । इस अपरिवर्तनशील
की रचना परिवर्तनों से युक्त होती है । इस परिवर्तनशील संसार में जो कुछ भी
परिवर्तन हो रहे हैं वह कर्मों के प्रभाव से हैं । कर्मों की प्रेरणा हम ग्रहण कर
रहें हैं इच्छाओं से । यह इच्छायें ही अज्ञान का स्वरूप हैं । सत्य का ज्ञान ना
होना ही अज्ञान है ।
अपरिवर्तनशील को परिवर्तन से युक्त द्वारा नहीं जाना जा
सकता है । ज्ञान को अज्ञान के माध्यम से नहीं जाना जा सकता है । अपरिवर्तनशील ही
एकमात्र सत्य है । यही एकमात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है ।
परिवर्तनशील असत्य है । परिवर्तन का होना ही उसकी असत्यता का प्रमाण है ।
समस्त परिवर्तनों का मूल कर्म होता है । कर्म के द्वारा ही
परिवर्तन सम्भव होते हैं । कर्मों की गुणवत्ता ही बंधन या मुक्ति हैं । कर्मों की
गुनवत्ता निर्भर करती है उसके प्रेरणाश्रोत पर । प्रेरणाश्रोत जबतक अज्ञान पर
लम्बित होगा मुक्ति सम्भव नहीं होगी । अज्ञान अर्थात सत्य से परे|
कर्मों का प्रेरक परम् सत्य है । कर्मों की कर्ता असत्य है
। यह सत्य का स्वरूप है । ज्ञान है । इसके विपरीत भ्रम है । भ्रम ही अज्ञान का
स्वरूप है ।
सोमवार, 21 अप्रैल 2014
मनुष्य की पूर्णता
हमारे अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया प्रकृतीय मोंह के
वशीभूत हमें आभाव का अनुभव कराती है । आभाव की अनुभूति समस्त मानवीय सुखों का नाश
करने वाली होती है । हम सभी के मस्तिष्क में दोनों ही प्रकार के विचार विद्यमान
रहते हैं । पहले वह विचार जो हमें उत्थान की ओर ले जाते है । परम् सत्य की चिर
दिव्य शांति की ओर । दूसरे वह विचार जो प्रकृतीय मोंह की वृद्धि करने में सहायक
होते हैं । इस प्रकृति निर्मित शरीर में प्रकृति के विज्ञान के प्रभाव द्वारा
उपरोक्त दोनों ही प्रकार के विचार मस्तिष्क में रहते है । यह निर्भर करता है
मनुष्य के सचेष्ट प्रयत्नों पर कि वह अपने अंदर विद्यमान उत्थानकारक प्रवृत्तियों
को विकसित करने के लिये आवश्यक उपाय करें ।
जब तक मस्तिष्क उपरोक्त दोनों ही विचारों के प्रभाव में
रहता है । उसका विवेक अपने उत्थान के लिये दृढता से संलग्न होने को कटिबद्ध नहीं
रहता है । तब तक वह भ्रमात्मक स्थितियों को झेलता है ।
जब वह अपने उत्थान के लिये कटिबद्ध हो जाता है । योगशास्त्र
के द्वारा सुझाये पथों का अनुसरण कर जीवनयापन करने लगता है । ऐसी दशा में निश्चय
ही उसे मनुष्य शरीर में रहते ही पूर्णता की स्थिति प्राप्त होती है ।
रविवार, 20 अप्रैल 2014
गीता में योगा
श्रीमद् भागवद्गीता में सम्पूर्ण योगशास्त्र दिया गया है ।
योगशास्त्र जो कि पूर्ण विस्तार से है, लचीला है, और आत्मा को क्रमबद्ध चरणों में प्रकृतीय मोंह से मुक्त करने वाला है ।
स्मरणीय है कि आत्मा अपने शुद्ध मौलिक स्वरूप में अर्थात् ब्रम्ह की मर्यादा के
अनुकूल स्वरूप में प्रकृतीय गुणों से अछूता होता है । परंतु प्रकृति के मध्य रहते
प्रकृतीय गुणों का भोग करते वह प्रकृतीय मोंह का कलंक ओढ लेता है । यही वह स्थिति
होती है जिसका भान होने पर वह महसूस करता है कि हम परमात्मा से बिछुड गये हैं ।
खोयी हुई ब्रम्ह की मर्यादित छवि को फिर से पाने के लिये, ओढी हुई प्रकृतीय मोंह का नाश करने के लिये उसे अपने सम्पूर्ण पुनर्निर्माण
की आवश्यकता होती है । यह अवसर श्रीमद् भागवद गीता में वर्णित योग-शास्त्र अति सुगमता
से प्रदान करता है । यह योगशास्त्र मनुष्य के अंत:करण के पुनर्निर्माण के लिये एक
पूर्ण संकलित एकीकृत ज्ञान है जो कि उसे प्रकृतीय मोंह के जेल से मुक्त कराके उसे
एक व्यापक सुहृद प्रेममय व्यक्तित्व के रूप में पर्णित करने वाला है । एक ऐसा
व्यक्तित्व जिसमें जीवन जीने के मूल्य ही बदल जाते हैं । जीवन दु:ख और कलह से
मुक्त हो शांत दिव्य आनंद की स्थिति भोग करता है । इस योगशास्त्र की प्रत्येक विधा
से सम्बंधित अनुशंसा योगा कही जाती हैं ।
शनिवार, 19 अप्रैल 2014
युज
युज शब्द धातु है । इसका अर्थ होता है । बाँधना । इस शब्द
से बना योग । मनुष्य की मानसिक शक्ति को बाँधना । इस मानसिक शक्ति को संतुलित करना
। इस मानसिक शक्ति को और अधिक विकसित करना । मनुष्य के समस्त कार्य सामर्थ्य को
मस्तिष्क की शक्ति के माध्यम से सुनियोजित करना । उसे कार्य में प्रयोग के लिये
एकाग्र करना ।
योग द्वारा अर्जित शक्ति के सन्यमित प्रयोग द्वारा विकसित
होगा एक ऐसा व्यक्तित्व जोकि व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठ पारलौकिक प्रतिभा से
युक्त होगा । मनुष्य की आत्मा प्रकृतीय मोंह के बंधन से मुक्त होकर एक विकसित
सुहृद मानवीय गुणों से युक्त व्यक्तित्व में पर्णित होगी उपरोक्त समस्त परिवर्तन सम्भव होगा भारतीय धर्मदर्शन द्वारा
सुझाये गये योगशास्त्र का अनुशरण करने के फलस्वरूप । योगशास्त्र में सुझायी गयी
विभिन्न विधायें प्रयोगकाल में तो भिन्न प्रतीत होंगी परंतु इनके प्रयोग द्वारा
उपलब्ध होने वाले अंतिम परिणाम की अनुभूति प्रत्येक विधा की एक ही होगी ।
शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014
परिचय
भारतीय धर्मदर्शन इस सृष्टि के परम् सत्य का परिचय कराता है
। प्रारम्भिक अवस्था में यह परिचय मात्र बौद्धिक स्तर तक होता है । परंतु यह परिचय
उसके अपने जीवन के सत्य अनुभव तक कराना उसका लक्ष्य होता है ।
इस सम्बंध में यह कवायद की जाती है कि मनुष्य उस परम् सत्य
का ही अंश होता है । इसे सत्य माने जाने की दशा में मात्र मनुष्य को उसके अपने
वास्तविक स्वरूप के बोध को जाग्रित करना ही परम् सत्य को जान लेने के समान होगा ।
दूसरी कवायद यह की जाती है कि मनुष्य यह महसूस करता है कि वह परम् सत्य से बिछुड
गया है । इसे सत्य माने जाने की दशा में उसे एक ऐसी विधा को जानने की आवश्यकता
होती है कि वह प्रति पल यह स्मरण रख सके कि वह उस परम् सत्य का ही अंश है और इसके
अतिरिक्त कोई विचार मात्र भ्रम है ।
श्रीमद् भागवद् गीता में इस सृष्टि के परम् सत्य का ज्ञान
और उस परम् सत्य का सत्य अनुभव पाने की क्रिया विधि दोनों ही वर्णित है । इसलिये
वर्तमान प्रकरण योगशास्त्र को विस्तार पूर्वक जानने के लिये श्रीमद् भागवद् गीता
के अंश उद्घृत किये जाते रहेंगे । ज्ञातव्य है कि श्रीमद् भागवद् गीता पुराणों की
श्रेंणी का ग्रंथ है जिसे ब्रम्ह विद्या व उस ब्रम्ह को अपने द्वारा इस जीवन के
अनुभव के रूप में पाने की सम्पूर्ण विधि के वर्णन को प्रमाणिक माना गया है ।
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