आत्मा परम् सत्य का अंश है । यह
मात्र परम् सत्य को व्यक्त करने वाला नहीं है अपितु उसका वास्तविक पुत्र समान
हिस्सा है । इस सत्य को जो भी व्यक्ति अपने जीवन में सत्यरूप में अनुभव कर तद्नुसार
उस परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप जीवन यापन कर सकता है वही सर्वोत्कृष्ट जीवन का
भोग करता है । प्रकृतीय मोंह में बँधना आम जीवन का स्वरूप है । इस मोंह से बचना
विषेस उपलब्धि है । विषेस उपलब्धि विषेस प्रयत्नों से ही मिलेगी । यह उस परम् सत्य
का विज्ञान है कि उन्होने संसार को ऐसा बनाया है कि इसमें भटकना आम पद्धति है ।
परंतु इस प्रचलित विचलन से बचकर विषेस जीवन भी हममें से ही लोग पाते हैं । इसके
लिये आत्मा की गरिमा को पहचानना । उस गरिमा के अनुरूप आचरण करना ही अपेक्षित
प्रयत्न है ।
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