शाश्वत् परम् सत्य जो कि अपरिवर्तनीय चिर सत्य है वह किसी
परिवर्तनशील क्षणभँगुर कर्म द्वारा नहीं जाना या पाया नहीं जा सकता है । परंतु कर्म
आधार तैयार करता है जिससे परम् सत्य को पाया जा सके । मुक्ति ज्ञान से ही सम्भव
होती है । परंतु ज्ञान सही धारणा के बिना नहीं सम्भव होगा । इसलिये सही धारणा के
लिये सही मानसिक स्थिति में प्रभु को समर्पित कर्म करना परम् आवश्यक वाँक्षना है ।
इस प्रकार प्रभु को समर्पित भाव से किया गया कर्म यज्ञ की आहुति के समान हो जाता
है । यह अपने अस्तित्व को प्रभु के दिव्य अस्तित्व को अर्पित करने के तुल्य होता
है । ऐसे कर्म द्वारा मस्तिष्क पवित्र होता है । कर्म बंधनकारी नहीं रह जाते
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