यदि कंचिद किसी कार्य करने की
पद्धति से शत्रुता है तो यह शत्रुता कार्य से नहीं है अपितु कार्य द्वारा निर्वाण
उपलब्ध करने की प्रक्रिया से है । सत्य का ज्ञान पाने के लिये सत्य स्थिति से
अनभिज्ञता सबसे प्रबल शत्रु होता है । अज्ञान यदि कंचिद मूल व्याधि है तो इस
व्याधि का एकमात्र सरताज इलाज़ ज्ञान है । अपरिवर्तनीय सत्य का ज्ञान परिवर्तनशील
कार्य द्वारा नहीं सम्भव हो सकता है । सही मन:दशा द्वारा कर्म के अभ्यास द्वारा
सत्य के ज्ञान का आधार निर्मित होता है।
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