जिस कुरू क्षेत्र का श्रीमद्
भागवद् गीता में वृतांत है वह हम प्रत्येक का अपना मस्तिष्क ही है । इसमें सद्
विचार स्वरूप पाण्डव व दुर्विचार स्वरूप कौरव बसते हैं । उत्तराधिकार का प्रश्न
सामाजिक रूप से प्रचलित वंश की मर्यादानुसार प्रतिस्थापन की विधा से भिन्न व्यक्ति
अपने अंदर विद्यमान सद् विचार अथवा दुर्विचार किसे प्रफुल्लित होने हेतु कर्म करता
है उस पर आधारित उसका व्यक्तित्व विकसित होगा । आवश्यक नहीं कि जिसके पूर्व के
कर्म भ्रम पर आधारित थे तो वह ज्ञान पाने के लिये उद्यत नहीं हो सकता है । यह हर
प्रत्येक मनुष्य के अपने मस्तिष्क के अंदर का साम्राज्य उसकी अपनी धरोहर होती है ।
इसमें परम् सत्य की मर्यादा को जान उस परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप कर्म करने को उद्यत
होने पर जीवन विकसित व्यक्तित्व की ओर उन्मुख होता है । इस संसार में कोई भी
व्यक्ति पूर्ण रूप से आदर्श के अनुरूप नहीं होता है । परंतु सही पथ से कर्म कर
जीवन को उत्कृष्ट बनाने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिये ।
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