किसी भी व्यक्तित्व के उत्कर्ष में
उद्देष्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान होता है । व्यक्ति क्या उद्देष्य धारण कर
जीवन यापन कर रहा है । उस उद्देष्य को अपने समस्त कार्यकारी अंगों के आम अभ्यास के
रूप में व्यवहृत कर रहा है । उस उद्देष्य की पूर्ति में उसने अपने कर्तापन के
अहंकार को कितना निर्मूल कर लिया है । उसने सर्वभौम परम् सत्य के प्रयोजन को पूर्ण
करना ही मानो अपना उद्देष्य निर्धारित कर लिया है । सर्वभौम सत्य ने इस संसार को
चर्मोत्कर्ष ज्ञान तक पहुँचाने के लिये ही बनाया है । इसलिये जो भी मनुष्य उस
सर्वभौम सत्य के प्रयोजन को ही अपना उद्देष्य निर्धारित करेगा उसके व्यक्तित्व का
अतुलनीय विकास होगा ।
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