कर्म अथवा भक्ति आत्मज्ञान के लिये
साधन हैं । आत्मज्ञान स्वतंत्र अनुभूति है जो कि आत्मा पर आच्छादित मोंह का नाश
होने पर ही मिलती है । परंतु इस आच्छादित करने वाले मोंह का नाश करने के लिये कर्म
अथवा भक्ति साधन हैं । कर्म अथवा भक्ति आत्मज्ञान नहीं है । आच्छादित करने वाला
मोंह होता बहुत बिकट है । यह व्याधी अनादिकाल से आत्मा को ग्रसित किये हुये होती
है । इससे मुक्ति के लिये दृढ और सतत प्रयत्न की आवश्यकता होती है । इस प्रयत्न के
लिये सही मानसिक स्थिति में कर्म करना अथवा पूर्णसमर्पण से भक्ति द्वारा मोंहको
नाश करने का प्रयास उपलब्धि कराता है ।
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