कर्म के प्रभाव द्वारा उत्पन्न
होने वाला कर्मफल । कर्मफल के प्रभाव से किये जाने वाला नया कर्म । कर्म श्रँखला
में बँधना बंधन है । इस बंधन से मुक्ति का विचार । विश्लेषणात्मक अध्ययन यह प्रगट
करता है कि बंधन मात्र कर्म करने से नहीं पैदा होता है । बंधन की जड होती है कर्म
करने के निमित्त में । कर्म करने का निमित्त यदि इच्छाओं की पूर्ति के आधार पर है
तो निश्चय ही उस कर्म के फल के आधार पर वह कर्ता व्यक्ति नये कर्म करेगा । प्रकृति
सतत कार्य करती है । इसलिये यदि कोई कार्य से सन्यास का लक्ष्य करेगा तो वह
प्रकृति के कोप का भोगी बनेगा । इसलिये योग्य विचार यह है कि कार्य किये जाँय
परंतु कार्य को करने की प्रेरणा ग्रहण करने में विचारशील रहा जाय । यही धर्मदर्शन
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मोहाशक्त अर्जुन को बताया
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