जितना कुछ संसार दीख रहा है सब
प्रकृति है । जो कुछ भी संसार में हो रहा है सब की कर्ता प्रकृति है । प्रकृति जो
कुछ भी कर रही है वह पुरुष के द्वारा ही सम्भव हो रहा है । पुरुष अदृष्य है अज्ञेय
है । जो भी ज्ञान सम्भव है उसका माध्यम मस्तिष्क होता है । अज्ञेय को जानना ज्ञान
है । इसलिये मस्तिष्क का नियंत्रित व संयमित संचालन ही ज्ञान पाने की सफलता है ।
यही रहस्य कुँजी है । इच्छाओं द्वारा मस्तिष्क दूषित होता है । ज्ञान सम्भव नहीं
रह जाता है ।
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