मुक्ति और बंधन का विचार केवल
मनुष्य योनि के लिये है । परम् सत्य सदैव मुक्त है । वनस्पति और जानवर इस परिधि
में आते ही नहीं हैं । मनुष्य यदि केवल वंश परम्परा से प्राप्त गुणों से संचलित
होता तो नैतिकता का कोई अस्तित्व ही नहीं रहता । सत्य और असत्य का ज्ञान होने के
बाद क्या उचित होगा का चुनाव करना यह विवेक का विषय है । यह विवेक जब सही स्वरूप
में जाग्रित होता है तभी कोई उत्थान के पथ पर अग्रसर हो सकेगा । गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने मोंह से ग्रसित अर्जुन को सत्य और मोंह दोनो का स्वरूप बताने के बाद
अर्जुन को अपनाने के लिये चुनाव करने को कहते हैं । यह अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थल
होता है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें