योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि जो
भी मनुष्य प्रकृतीय मोंह से मुक्त होकर, जिसने अपनी ईंद्रीय वासनाओं की भोग की कामना पर विजय
कर लिया है, जो सदैव आत्मबोध को धारणकर, बिना फल की कामना किये कर्म को
करता है वह सर्वोच्च परम् सत्य की दिव्य शांति और आनंद के जीवन का भोग करता है ।
इस उपलब्धि पर योगशास्त्र का लक्ष्य पूर्ण होता है ।
रविवार, 3 अगस्त 2014
शनिवार, 2 अगस्त 2014
रस्सा कशी
परम् सत्य ने मनुष्य को ऐसा बनाया
है कि इसका जीवन प्रकृति और आत्मा के मध्य परस्पर व्यवहृत करने की एक रस्सा कशी के
सदृष्य है । प्रकृति आत्मा को अपने गुणों में मोंहित करने में सदैव सफल होती है ।
प्रकृतीय गुणों में मोहित आत्मा इंद्रीय भोगो के लिये लालायित रहती है । इस प्रक्रिया
से गुज़रती आत्मा सर्वथा अपने स्वरूप और ईश्वरीय मर्यादा को पूर्णतया विस्मृत कर
अहंकार के वशीभूत इच्छाजनित कार्यों को करने में संलग्न रहती है । यह स्थिति
मनुष्य को दु:ख और संताप के हिलोरों के मध्य उठाता पटकता रखती है । इसके विपरीत
यदि सत्संग के प्रसाद से कंचिद कोई आत्मीय बोध और ईश्वरीय मर्यादा के
जीवन पाने को प्रयत्नशील होता है तो उसे एक संघर्ष की स्थिति का सामना करना होता
है । प्रकृतीय मोंह का नाश विषेस प्रयत्नों से ही सम्भव है ।
शुक्रवार, 1 अगस्त 2014
बाधा से मुक्ति
अपने अस्तित्व की सही पहचान में
बाधक मोंह और आसक्ति से मुक्ति हेतु सुझाये गये मार्ग भक्ति अथवा कर्म को अपनाना
होगा । भक्ति समर्पण है । कर्म आत्मविश्वास है । जिसे जो अनुकूल प्रतीत हो वह उसे
अपनावे । परिणाम दोनो ही पथ से एक ही मिलेगा । मोंह और आसक्ति से मुक्ति । भक्ति
अथवा कर्म ये आपकी आत्मा का स्वरूप नहीं हैं । परंतु मोंह और आसक्ति से ग्रसित
आत्मा की मुक्ति के पथ हैं साधन हैं । व्याधियों से मुक्त हो जाने पर आत्मा अपने
ईश्वरीय गुणों को प्रगट करेगी । उस शाश्वत् रूप के प्रकाश से व्यक्तित्व का नया
उत्कृष्ट परिचय प्रगट होगा ।
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