मनुष्य अपने अंदर विद्यमान परम्
सत्य की छाया को अनुभव कर सके, उसकी गरिमा के अनुरूप जीवन जी सके तो यह चर्मोत्कर्ष
उपलब्धि होगी । इसे पाने के लिये चाहे वह चिंतन व ध्यान का पथ अपनावे, चाहे प्रेम और समर्पण का पथ अपनावे अथवा कर्म फल से सन्यास को धारण कर कर्म
करे सभी उपलब्धि काल में भिन्न पथ होते हुये भी अंतिम गंतब्य पर अनुभव होने वाली
परम् सत्य की अनुभूति एक समान ही होगी । उपरोक्त तीनों ही विधायें आच्छादित करने
वाले मोंह का ही निवारण करने को लक्षित हैं । इस प्रकार यदि कहा जाय कि परम् सत्य
की अनुभूति यदि एक शरीर है तो ज्ञान इसके चक्छु हैं, स्नेह और प्रेम इसका हृदय है और
सन्यास इसकी कर्म प्रणाली है । योगा जहाँ ध्यानऔर ज्ञान का प्रतीक है वहीं प्रेम
और सेवा वह प्राचीन पथ है जिससे ज्ञान की मंजिल मिलती है ।
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