बुधवार, 25 जून 2014

आत्मनियंत्रित जीवन

आत्मा का विक्षेप मोंह जिसके हट जाने पर आत्मा परम् सत्य के सम्मुख शाश्वत् रूप में हो जाती है । इस शाश्वत् रूप में वह परम् सत्य की मर्यादा को समर्पित उनके प्रतिनिधि के रूप में कार्य में संलग्न होती है । इस स्तर के नियंत्रित जीवन में कोई कर्म बंधनकारी नहीं रह जाता है । मुक्त नियंत्रित आत्मा ही श्रेष्ठतम उपलब्धि होती है । इस स्थिति को पाने के लिये भक्ति और कर्म दोनों ही साधन के रूप में होते हैं । भावुक प्रकृति के लोगों के लिये भक्ति सुगम होती है । कर्मशील और आत्मविश्वासी लोगो के लिये कर्म पथ सुगमहोता है । आत्मनियंत्रित लोगों को ही ज्ञान मिलता है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें