परम् सत्य प्रत्येक रूप अस्तित्व में विद्यमान है इस सत्य
में ही धर्मदर्शन की मान्यता का आधार निहित होता है । यदि विलय का अर्थ इसप्रकार
निकाला जाय कि जिसमें जीव की सत्ता को शून्य करार दिया जाय अथवा परम् सत्य के
पारलौकिक अस्तित्व को प्रश्नवाचक बताया जाय तो भक्ति का कोई स्थान नहीं रह जावेगा
। निर्माता प्रकृति और निर्मित प्रकृति के मध्य भेद ही आधार होता है भक्ति का । परम्
सत्य का कोई दूसरा स्वरूप नहीं है । इसलिये सत्य तो अद्वैत ही है । द्वैत का
अस्तित्व तो आराधना के लिये ही है । आराधक असत्य होते हुये भी अस्तित्वधारी है ।
आराध्य सत्य है । द्वैत का भाव आराधना के उद्देष्य से ही है । परम् सत्य करुणावश अपने
आराधक को आश्वासन देता है कि पूर्णनिष्ठा से समर्पित आराधक की सम्पूर्ण हितरक्षा
वह करेगा । आराध्य के संरक्षण से आश्वस्थ आराधक प्रेम और समर्पण से आराध्य की
आराधना करता है । यह प्रेम और विश्वास का रिश्ता है । आराधना तो वैयक्तिक ईश्वर
प्रकृति की ही की जाती है । जबकि परम् सत्य प्रकृति नहीं है । यह सत्य है कि भक्त
आराधक मोंह से मुक्ति के लिये नहीं अपितु आराध्य की करुणा की कामना से आराधना करता
है । ज्यादा से ज्यादा आराधक के मस्तिष्क में यह विश्वास रहता है कि आराध्य उसे मोंह
से मुक्त करेगा ।
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