अव्यक्त की उपासना कठिन लक्ष्य होता है । इसे प्रत्येक
व्यक्ति साध्य नहीं कर सकता है । इसलिये अद्वैत की उपासना के स्थान पर व्यक्त रूप
में वैयक्तिक ईश्वर प्रकृति के प्रति समर्पण का पथ सुझाया गया । आदिकालीन महात्मा
शंकर इसका मुल्यांकन करते हुये इसे क्रमबद्ध मुक्ति की तैयारी के लिये सक्षम उपाय बताये
। यह प्रयत्नों की तुलनात्मक मूल्याँकन में अपनी इच्छाओं को ईश्वरीय प्रयोजन में
अर्पित करने तथा परम् सत्य के चिन्तन द्वारा अनुभूति करने की अपेक्षा सरल पथ है ।
बताया जाता है कि वैयक्तिक ईश्वर प्रकृति केवल साधक के सच्चे समर्पण को मान्यता
देती है । साधक के अन्य गुणों की कोई वाँक्षना नही होती है ।
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