रविवार, 11 मई 2014

भक्ति

भक्ति भज शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है स्वामी की सेवा । यह ईश्वर के प्रति प्रेम का सम्बंध है । नारद मुनि इसकी परिभाषा करते हुये कहते हैं कि यह ईश्वर के प्रति प्रगाड प्यार है । साण्डिल्य मुनि के अनुसार ईश्वर के प्रति प्रगाड चाहत है । यह ईश्वर की प्रभुता में विश्वास के आधार पर समर्पण है । मुनि भोज के अनुसार ऐसा प्यार जिसमें इंद्रीय भोग की कामना किये बिना अपने समस्त प्रयत्नों को प्रभु को समर्पित करना है । यह इतने गहरे प्यार का अनुभव है जिसमें इच्छाओं का पूर्ण निषेध किया जाता है । सम्पूर्ण हृदय ईश्वर के प्यार से ओतप्रोत करना ही लक्ष्य होता है । वास्तविकता में भक्ति के पक्षकार संतजन आत्मा की मोंह से मुक्ति की कामना की अपेक्षा अपने ईष्ट की इच्छा के अनुरूप अपने को बनाने की संसतुति करते हैं । भक्त की आत्मा ईश्वर के महिमा के ध्यान द्वारा ईश्वर के परम् सत्य स्वरूप की अच्छाइयों का सतत स्मरण द्वारा ईश्वर का सतत भक्ति भाव से स्मरण द्वारा ईश्वर के गुणगान की चर्चा अन्य के साथ करने के द्वारा ईश्वर के गुणों का गायन अपने संग के मनुष्यों सामने करने के द्वारा और प्रत्येक कृत्य को ईश्वर की सेवा के रूप में करने के द्वारा अपने को ईश्वर के सन्निकट पहुँचती है । 

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