परम् सत्य को जानना ज्ञान है । भक्ति ज्ञान नहीं हैं ।
भक्ति ज्ञान पर आधारित है । ज्ञान प्राप्त महापुरुषों द्वारा भक्ति बतायी गयी है ।
इसे अपनाने से भक्त आत्मा को उसी आत्मीय शांति की अनुभूति मिलती है जो ज्ञान प्राप्त
होने से मिलती है । भक्त के लिये गुण बताये गये आराध्य के प्रति विनम्र मानसिक
चेतना, आराध्य के प्रति आज्ञाकारिता आराध्य की सेवा में प्रतिपल
तत्पर, व्यापक आराध्य के सम्मुख तुच्छ भक्त के रूप प्रस्तुत, और कोमल प्यार संजोये आराध्य को पूर्णसमर्पण को तत्पर । इतने गुणों को संजोये
भक्त आराध्य से जुडना जाहता है । ऐसा करने से उसे वही आत्मीय शांति मिलती है जिसे
ज्ञानप्राप्त होने पर पाया जाना बताया जाता है । इस रूप में परम् सत्य ही एकमात्र
पुरुष है अन्य सब स्त्री समान हैं जो उस एक पुरुष से जुडना चाहते हैं ।
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