समर्पण ही उपलब्धि है भक्ति की । जिस आराध्य को भक्त
समर्पित हुआ उसी में वह विलीन हो गया । भक्त का कोई अलग अस्तित्व नहीं रह गया । जो
भी शेष है वह आराध्य ही है । आराध्य तो परम् सत्य दिव्य स्वरूप शांति का समुंद्र है
। यही सब कुछ वह भक्त भी हो गया । यहीं उपलब्धि ज्ञानी की भी होती है । यही
उपलब्धि योगी की भी होती है । यही भक्त को भी मिला । इसीलिये भक्त को आराध्य को
जानने की आवश्यकता नहीं थी । मात्र उसे आराध्य को सम्पूर्ण सत्य समर्पण की एकमात्र
वाँक्षना बतायी गयी थी । समर्पण ऐसे स्तर का जिसमें उसका अपना कोई स्वरूप शेस ना
बचे । अहंकार मोंह सभी छूट जायेगें । बिना इन व्याधियों के छूटे समर्पण होगा ही
नहीं । आराध्य के प्रति श्रद्धा संजोये भक्त के समर्पण से पैदा होने वाला रूप है
भक्ति । भक्ति उस सर्वशक्तिमान सक्षम आराध्य के प्रति समर्पण व विश्वास है जो कि
कृपालु होकर इस संसार के समस्त भक्तों की विकृति आत्माओं को उनकी विकृति से मुक्त
करके उद्धार के लिये स्वयँ आता है ।
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