प्रकृति और पुरुष (आत्मा) दो भिन्न अस्तित्व है । प्रत्येक
स्वरूप इन दोनों के सन्युक्त होने से ही सृजित होते हैं । प्रकृति की प्रत्येक
रचना समय के साथ परिवर्तित होने वाली होती है । प्रत्येक परिवर्तनशील रचना में
विद्यमान पुरुष ही स्थायी अपरिवर्तनशील अस्तित्व होता है । यह अपने मूल स्वरूप में
किसी क्रिया का कर्ता नहीं होता है । प्रकृति गुणयुक्त होती है । गुण का अर्थ होता
है रस्सी के तीन धागे । रस्सी का नैसर्गिक प्रभाव होता है बंधन । आत्मा जोकि ना ही
प्रकृति के अधीन है ना ही प्रकृति के ऊपर आश्रित है और ना ही प्रकृति द्वारा जाना
ही जा सकता है फिर भी प्रकृति के गुणों के मध्य रहते और प्रकृतीय गुणों का भोग
करते प्रकृति के मोंह से ग्रसित हो जाता है । यह स्थिति स्वाभाविक संतुलन को भंग
करने वाली होती है । समस्त विकारों की जननी होती है । योगशास्त्र इसी विकृति से
आत्मा को मुक्त कराने का उपाय सुझाती है । आत्मा और प्रकृति इन दो स्वतंत्र
अस्तित्वों को आधार मान कर आत्मा को प्रकृतीय संसर्ग से मुक्त कराने का विज्ञान
बताने वाला धर्मदर्शन साँख्यदर्शन ।
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