आत्मा शुद्ध अर्थात किसी भी मिश्रण से मुक्त है । यह किसी
क्रिया का कर्ता नहीं होता । इसे स्वयं अपने अंत:करण से अपने अस्तित्व में स्थिर
रहने के लिये शक्ति प्राप्त होती है । यह प्रकृति निर्मित किसी स्वरूप की उत्पत्ति
नहीं होती । यह प्रकृति निर्मित किसी उत्पत्ति पर आश्रित नहीं होती । यह प्रकृति
निर्मित किसी रचना के माध्यम से जानी नहीं जा सकती । प्रत्येक प्रकृतीय स्वरूप में
विद्यमान आत्मा प्रत्येक दूसरे प्रकृतीय स्वरूप में विद्यमान आत्मा से भिन्न होती
है । यह भिन्नता अनंत काल तक भिन्नता के रूप में ही स्थिर रहती है । यह प्रकृतीय
गुणों की भोक्ता होती है ।
प्रकृति के मध्य रहते और प्रकृतीय गुणों का भोग करते यह
प्रकृतीय गुणों में आसक्ति जनित कर प्रकृतीय मोंह से आच्छादित हो जाती है ।
योगशास्त्र द्वारा सुझाये गये किसी उद्धार विधि के प्रभाव
से यदि कंचिद आत्मा प्रकृतीय सम्बंध से मुक्त हो जाती है तो यह इसके मोक्ष की
स्थिति होती है । यह इसकी अपने मूल स्वरूप में वापसी के तुल्य होता है ।
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