परम् सत्य की इस प्रकृतीय शरीर में विद्यमान छाया आत्मा ।
इस आत्मा पर आच्छादित प्रकृतीय मोंह । विकार । इस विकार का निवारण । योगशास्त्र ।
योगशास्त्र के प्रचलित तीन विधायें । ज्ञानमार्ग कर्ममार्ग भक्तिमार्ग । इन तीनों
ही विधाओं में दो उभयनिष्ट प्रक्रियाओं को प्रबलयोगकारक बताया गया है । प्रथम
ध्यान । द्वितीय मस्तिष्क की वृत्तियों का नियंत्रण | ध्यान उस परम् सत्य की
उपस्थिति का । परिणामत: आचरण उस परम् सत्य की मर्यादा के अनुरूप । मस्तिष्क की
वृत्तियों का नियंत्रण मानसिक संकल्प द्वारा । प्रबल इच्छा शक्ति द्वारा ।
मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले विविध विचारों का नियंत्रण । मस्तिष्क में जाग्रित
होने वाली अनेकानेक इच्छाओं का नियंत्रण । इसके लिये उपयोगी योगा । महर्षि पातँजलि
का मत है कि योगा मस्तिष्क की वृत्तियों को नियंत्रित करने की विधा है । इन समस्त
नियंत्रणों को प्रभावी रूप से लागू करने पर उपलब्धि होगी परम् सत्य के अपने अंदर
विद्यमान होने का सीधा अनुभव । दिव्य जीवन ।
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