परम् सत्य का ज्ञान पाने हेतु प्रतिपादित धर्मसिद्धांत के
नियमों का संग्रह जिसे कि साँख्यदर्शन के शीर्षक अंतर्गत बताया गया उसमें पुरुष (आत्मा)
और प्रकृति को दो प्रधान अवयव बताया गया जिनके मध्य भेद पर आधारित संसार के
विभिन्न रूप व उनकी समस्त गतिविधियाँ विस्तरित हैं । आत्मा एकमात्र स्थायी अवयव है
इस समस्त परिवर्तनशील प्रकृतीय रचनाओं के मध्य । आत्मा मूल स्वरूप में अकार्यकारी इस
संसार से भिन्न इस संसार के अवलम्ब से परे इस संसार के मानको से अज्ञेय स्वयंपोषित
अवयव है । इसके विपरीत प्रकृति गुणयुक्त है । गुण अर्थात् बाँधने की क्षमता से
युक्त । परिणामत: आत्मा प्रकृतीय मोंह में बँध जाता है । प्रकृति इतनी
विज्ञानयुक्त है कि वह हर प्रत्येक दशा में आत्मा को अपने मोंह में बाँधने में
समर्थ होती ही होती है । इस प्रकार मोंहग्रसित आत्मा असंतुलन का केंद्र बन जाती है
। इस असंतुलन का निवारण का विचार ही योगशास्त्र है ।
योगशास्त्र में वर्णित तीन विधायें । प्रथम ज्ञानमार्ग । इस
पथ में तीनों अवयवों नामत: आत्मा प्रकृति और मोंह का अलग अलग स्वरूप ज्ञान होना
अनिवार्य होता है । फिर आच्छादित करने वाले मोंह का नाश करने की विधि जानना होता
है । आत्मा जब पूर्णरूप से प्रकृतीय संसर्ग से मुक्त हो जाता है । मोक्ष की स्थिति
है ।
प्रकृति के मध्य रहते । प्रकृतीय गुणों का भोग करते ।
प्रकृति के संसर्ग से पूर्णरूप से मुक्त । निरंजन । यह आदर्श स्वरूप पाना लक्ष्य
होता है । योगशास्त्र ।
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