शुक्रवार, 9 मई 2014

आत्मावलोकन

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मोंहग्रसित अर्जुन को ज्ञान बताया । अर्जुन को ज्ञान सुनकर ऐसा लगाकि उसे बतायेनुसार करना चाहिये । परंतु जैसा कि मनुष्य का स्वभाव होता है कि बताये हुये पर विश्वास कैसे करें । उसने जिज्ञासा व्यक्त किया कि ज्ञान का साक्षात् रूप दर्शन कराइये । गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि तुम इन चक्छुओं से ज्ञान को नहीं देख सकोगे । इसलिये मैं तुम्हे दिब्य चक्छु देता हूँ । दिब्य चक्छु क्या थीं ? चक्छु जो कि सत्यलोक को देख सकें । वर्तमान चक्छु क्या देखती हैं ? माया लोक । माया जो कि सत्य नही है । जो काल के साथ परिवर्तनशील है । सत्य क्या है ? जो समय के साथ परिवर्तित नहीं होता है । परिवर्तनशील वस्तुरूप और चिर दिव्यरूप दोनों को देखने के लिये अलग मानक हुये है । मानक जिसमें व्यवस्था के प्रति निष्ठा है वह दिव्यरूप का दर्शन करायेगा । मानक जिसमें इच्छाओं को मौलिक प्रधानता होगी वह मायालोक तक ही सीमित होंगे । वह सत्यलोक का दर्शन नहीं कर सकेंगे । सत्यलोक निष्ठावान के लिये है । मायालोक भ्रमात्मक छाया को अनुसरण करने वालो का लोक है । मायालोक के निवासी को सत्यलोक में जाने के लिये कोई रोक नहीं है । परंतु सत्यलोक में यदि मायालोक का निवासी बिना चक्छु के जायेगा तो उसकी स्थिति एक अंधे व्यक्ति के समान होगी । इसलिये सत्यलोक में जाना है । सत्यलोक में निवास करना है । तो एक मात्र अंधपन उत्पन्न करने वाली इच्छाओं को त्यागना होगा । इसे त्यागते ही सत्यलोक की सुहावनी अनुकम्पा अमृत का स्वाद मिलेगा ।  

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