बुधवार, 7 मई 2014

आत्मचेतना

आत्मचेतना के जाग्रित हुये बिना जीवन का पूर्ण स्वामित्व सम्भव नहीं हो सकता है । वास्तविकता में आत्मचेतना की जिज्ञासा अपने अंदर विद्यमान जघन्यतम विरोधात्मक स्थिति का ज्ञान पाना है । इस आत्मचेतना को जाग्रित करने के लिये मनुष्य को अपनी शरीर अपने आचरण और अपने मस्तिष्क को एक तारतम्य में बनाना होता है । यह करना तब तक सम्भव नही हो सकता है जब तक उसके अंदर मोंह विद्यमान है । जब मनुष्य का संकल्प सत्यरूप में आत्मचेतना जाग्रित करने के लिये दृढ हो जाता है तब उसके अंत:करण में विद्यमान प्रकृतीय मोंह के प्रति उत्कर्ष भावनायें क्षीण होना प्रारम्भ हो जाती हैं । प्रकृतीय मोंह समाप्त होने की दशा में उसका मस्तिष्क शांत हो जाता है । मस्तिष्क की शांत स्थिति में उसकी आत्मा उस परम् सत्य की उपस्थिति का अनुभव करती है । इस स्थल पर ज्ञातब्य है कि मस्तिष्क में विद्यमान विचारों के तूफान तथा उन विचारों से जनित होने वाली इच्छाओं के वेग से ही सकल अशांति उत्पन्न होती है । इनका दमन ही प्रशस्थ करता है शांति । शांत मस्तिष्क की दशा में ही आत्मचेतना जाग्रित होना सम्भव होता है । मनुष्य अपने अंत:करण में विद्यमान परम् सत्य की उपस्थिति का अनुभव कर सकेगा । मोंह का आवरण ही उसे अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य से दूर किये हुये होता है । आत्मचेतना का जाग्रित होना मानो आच्छादित करने वाले मोंह का नाश करना है । जीवन के सत्य स्वरूप को पाना है । 

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