हम अपने प्रयत्नों द्वारा परम्
सत्य आराध्य को नहीं पा सकते । जब यह विचार मस्तिष्क में समा जावेगा तो एक मात्र
उपाय रह जावेगा समर्पण । बिना किसी शर्त समर्पण । यह भाउकता की पराकाष्ठा स्थिति
है । यह स्थिति भक्ति की वाँक्षनाओं प्यार व विश्वास से भी आगे है । हमारी
कुण्ठायें ही बाधा होती हैं । समर्पण की शाश्वततम स्थिति होती है प्रपत्ति । यह
आराध्य के कृपा का सीधा विश्वास है । आराध्य के प्रति विश्वास का पवित्र स्वरूप है
। यह समर्पण का चर्मोत्कर्ष स्वरूप है । जब हम अपने को पूरा खाली कर देंगे तो
आराध्य हमारे ऊपर शासन करेगा । आराध्य द्वारा इस अधिग्रहण में हमारे अपने आचरण, घमण्ड, मानसिक संकल्प, हमरी इच्छायें, और हमारे पूर्वाग्रह बाधक होते हैं । इन सबका परित्याग हमें आराध्य द्वारा
अधिग्रहीत करने के लिये योग्य पात्र बना देता है । हम अपने को आराध्य के हाथों
समर्पित कर देते हैं कि वह जैसा चाहे हमारे साथ करे ।
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