गुरुवार, 8 मई 2014

आत्मदर्शन

बाह्यजगत के समस्त वस्तु संसार के घटको का सज्ञान हम लेते हैं धारणाओं के माध्यम से । धारणायें जो पूर्व से मस्तिष्क में विद्यमान रहती हैं । चाहे ठीक उसी वस्तुरूप की अथवा समता की अन्य वस्तुरूप की । यह धारणायें कायम हुई रहती हैं इंद्रियों द्वारा ग्रहण किये गये ज्ञान के द्वारा । परंतु जब हम अपने अंत:करण में अपनी आत्मा का दर्शन करने के उद्देष्य से प्रयत्न करते हैं तो हमें उपरोक्त बाह्यजगत के लिये वर्णित पद्धति सहायक नहीं होती है । कारण कि हमें आत्मा के स्वरूप अथवा उससे मिलते जुलते किसी अन्यस्वरूप की कोई धारणा पूर्व से हमारे मस्तिष्क के संचित कोष में नहीं होती है । इन कारणों से आत्मदर्शन का लक्ष्य ज़टिल प्रमाणित होता है । प्रयत्न प्रारम्भ करने पर शुरू में हमें जो कुछ भी नया अनुभव सम्मुख होता है जिसका कि बाह्यसंसार के प्रयोजनों में पूर्व में कभी सन्योग नहीं हुआ है वही हमें आत्मस्वरूप के रूप में प्रतीत होता है । परंतु यह आत्मस्वरूप होता नहीं है । इसलिये आत्मदर्शन के प्रयत्न में सर्वप्रथम वाँक्षना बनती है कि हमें अपनी पूर्व की सम्पूर्ण धारणाओं की स्मृति को शून्य करना होगा ।  

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