प्रकृति निर्मित मस्तिष्क । समस्त नियंत्रणों का केंद्र ।
समस्त विकारों का सृजनस्थल । यहाँ पर सामान्य रूप से चेतन अवस्था के कृत्यों के
अतिरिक्त कुछ अर्धचेतन अवस्था के कृत्य भी पोषित होते हैं । कुछ ऐसे कृत्य जिनकी
व्याख्या सामान्य चेतन अवस्था के विवेक द्वारा नहीं की जा सकती है । ऐसे कृत्य
अतिशय प्रेम अथवा अतिशय घृणा के परिवेश से जनित होते हैं । ऐसे कृत्य मनुष्य कैसे
और क्यों करता है इसका उत्तर स्वयँ करने वाला भी नहीं दे पाता है । ऐसे कृत्य
जिन्हे कि बाद में जब वह अपने सामान्य चेतन अवस्था में होता है तो स्वयँ भी सोचता
है कि मैंने कैसे और क्यों किया था । पश्च्याताप करता है अपने किये हुये का । इना
समस्त का प्रभावी नियंत्रण मस्तिष्क के नियंत्रण द्वारा ही सम्भव हो सकता है । जिस
प्रकार किसी भठ्ठी में प्रज्वलित आग को नियंत्रित करने का सरलतम उपाय होता है कि
उसमें प्रयुक्त ईधन की पूर्ति नियंत्रित की जाय । ईधन ना मिलने की दशा में अग्नि
स्वत: शांत हो जावेगी । उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में व्याप्त समस्त अशांति का
जन्मस्थल उसका अपना मस्तिष्क की समस्त वृत्तियों को नियंत्रित किया जाय तो निश्चय
ही वह दिब्यशांति की ओर अग्रसित होगा । इसी उपलब्धि के लिये उसे अपनाना होगा
योगशास्त्र की किसी अनुकूल विधा को । इससे जाग्रित होगी उसमें एक स्थायी चेतना ।
इस चेतना के जाग्रित होने से उसे प्रतिपल अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की
उपस्थिति का बोध बना रहेगा । वह अपने सत्य स्वरूप के अनुरूप कर्म करेगा । संकीर्ण
मोंह के जीवन से परे व्यापक मुक्त जीवन के विस्तृत व्यक्तित्व का शांतजीवन जीयेगा
। संसार सदैव ऐसा ही रहा है । सदैव ऐसा ही रहेगा । मात्र कोई इसमें कैसे चीज़ों को
ग्रहण करता है के अंतर से उसका अपने जीवन का स्वरूप बदल जाता है । समस्त प्रकृति
का भोग करें परंतु उसमें बँधे नहीं । मोंह में
बंधना ही दु:ख का निमंत्रण है । इच्छाये होगी तो दु:ख रहेगा ही रहेगा ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें