मंगलवार, 6 मई 2014

नियंत्रण केंद्र

प्रकृति निर्मित मस्तिष्क । समस्त नियंत्रणों का केंद्र । समस्त विकारों का सृजनस्थल । यहाँ पर सामान्य रूप से चेतन अवस्था के कृत्यों के अतिरिक्त कुछ अर्धचेतन अवस्था के कृत्य भी पोषित होते हैं । कुछ ऐसे कृत्य जिनकी व्याख्या सामान्य चेतन अवस्था के विवेक द्वारा नहीं की जा सकती है । ऐसे कृत्य अतिशय प्रेम अथवा अतिशय घृणा के परिवेश से जनित होते हैं । ऐसे कृत्य मनुष्य कैसे और क्यों करता है इसका उत्तर स्वयँ करने वाला भी नहीं दे पाता है । ऐसे कृत्य जिन्हे कि बाद में जब वह अपने सामान्य चेतन अवस्था में होता है तो स्वयँ भी सोचता है कि मैंने कैसे और क्यों किया था । पश्च्याताप करता है अपने किये हुये का । इना समस्त का प्रभावी नियंत्रण मस्तिष्क के नियंत्रण द्वारा ही सम्भव हो सकता है । जिस प्रकार किसी भठ्ठी में प्रज्वलित आग को नियंत्रित करने का सरलतम उपाय होता है कि उसमें प्रयुक्त ईधन की पूर्ति नियंत्रित की जाय । ईधन ना मिलने की दशा में अग्नि स्वत: शांत हो जावेगी । उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में व्याप्त समस्त अशांति का जन्मस्थल उसका अपना मस्तिष्क की समस्त वृत्तियों को नियंत्रित किया जाय तो निश्चय ही वह दिब्यशांति की ओर अग्रसित होगा । इसी उपलब्धि के लिये उसे अपनाना होगा योगशास्त्र की किसी अनुकूल विधा को । इससे जाग्रित होगी उसमें एक स्थायी चेतना । इस चेतना के जाग्रित होने से उसे प्रतिपल अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की उपस्थिति का बोध बना रहेगा । वह अपने सत्य स्वरूप के अनुरूप कर्म करेगा । संकीर्ण मोंह के जीवन से परे व्यापक मुक्त जीवन के विस्तृत व्यक्तित्व का शांतजीवन जीयेगा । संसार सदैव ऐसा ही रहा है । सदैव ऐसा ही रहेगा । मात्र कोई इसमें कैसे चीज़ों को ग्रहण करता है के अंतर से उसका अपने जीवन का स्वरूप बदल जाता है । समस्त प्रकृति का भोग करें परंतु उसमें बँधे नहीं । मोंह में  बंधना ही दु:ख का निमंत्रण है । इच्छाये होगी तो दु:ख रहेगा ही रहेगा । 

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