गुरुवार, 1 मई 2014

प्रकृति

परम् सत्य एक पूर्णरूप से पारलौकिक स्वतंत्र स्वत:अस्तित्व है । दूसरी ओर प्रकृति लौकिक जगत की अस्तित्व है । यह स्वतंत्र नहीं हैं । यह परम् सत्य पर आश्रित अस्तित्व है । इसकी रचना घटको के सम्मलित होने से हुई है । इन्ही घटको के समंवय के अनुपात की भिन्नता द्वारा विविध स्वरूप उत्पन्न हुये हैं । इन प्रकृतीय स्वरूपों में सर्वाधिक विज्ञान सम्पन्न रचना मस्तिष्क के नाम से जानी जाती है । प्रकृति गुणयुक्त है । इसके गुणों का वर्गीकरण व अध्ययन द्वारा तीन नाम सम्मुख होते हैं । सत् रज़ तम । प्रकृतीय रचनाओं के भौतिक स्वरूप के विचार में सत्ब हल्कापन रज़ गति तम भारीपन । मस्तिष्क की क्रिया के विचार में सत् अच्छाई रज़ आसक्ति तम लिप्सा । यह तीनों ही गुण बंधनकारी हैं । इन्हे रस्सी के तीन धागों की संज्ञा दी जाती है । इन्ही गुणों के विभिन्न अनुपात में समंवित होनें से विभिन्न स्वरूप सम्भव हुये हैं । इसी प्रकृति के स्खलन द्वारा समस्त सृष्टि की समस्त गतिविधि सम्भव होती है । इसप्रकार समस्त सृष्टि में विस्तरित समस्त स्वरूप समस्त गुण तथा समस्त गतिविधि इसी प्रकृति के अधीन है ।  

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