परम् सत्य एक पूर्णरूप से पारलौकिक स्वतंत्र स्वत:अस्तित्व
है । दूसरी ओर प्रकृति लौकिक जगत की अस्तित्व है । यह स्वतंत्र नहीं हैं । यह परम्
सत्य पर आश्रित अस्तित्व है । इसकी रचना घटको के सम्मलित होने से हुई है । इन्ही
घटको के समंवय के अनुपात की भिन्नता द्वारा विविध स्वरूप उत्पन्न हुये हैं । इन
प्रकृतीय स्वरूपों में सर्वाधिक विज्ञान सम्पन्न रचना मस्तिष्क के नाम से जानी
जाती है । प्रकृति गुणयुक्त है । इसके गुणों का वर्गीकरण व अध्ययन द्वारा तीन नाम
सम्मुख होते हैं । सत् रज़ तम । प्रकृतीय रचनाओं के भौतिक स्वरूप के विचार में सत्ब
हल्कापन रज़ गति तम भारीपन । मस्तिष्क की क्रिया के विचार में सत् अच्छाई रज़ आसक्ति
तम लिप्सा । यह तीनों ही गुण बंधनकारी हैं । इन्हे रस्सी के तीन धागों की संज्ञा
दी जाती है । इन्ही गुणों के विभिन्न अनुपात में समंवित होनें से विभिन्न स्वरूप
सम्भव हुये हैं । इसी प्रकृति के स्खलन द्वारा समस्त सृष्टि की समस्त गतिविधि
सम्भव होती है । इसप्रकार समस्त सृष्टि में विस्तरित समस्त स्वरूप समस्त गुण तथा
समस्त गतिविधि इसी प्रकृति के अधीन है ।
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