परम् सत्य की खोज़ की ज्ञान पर
आधारित विधा तथा परम् सत्य का वास्तविक अनुभव पाना दोनों
को ही ज्ञान शब्द द्वारा व्यक्त किया जाता है । सेवा समर्पण ज्ञान के वास्तविक
अनुभव के श्रोत नहीं हैं । अधिक से अधिक यह ज्ञान पाने के निमित्त हैं । विज्ञान
के अर्धसत्य तथा आध्यात्मिक पूर्णसत्य में बहुत भिन्नता है । फिरभी विज्ञान के
सत्य की खोज़ को आगे बढाने पर पूर्णसत्य की खोज़ का पथ प्रशस्थ होता है । विज्ञान
मस्तिष्क पर आच्छादित प्रगति में बाधक दु:वृत्तियों का नाशकर मस्तिष्क को वह
क्षमता प्रदान करता है जिससे वह अपनी वर्तमान ग्राह्यता को पारकर उसलोक के ज्ञान
को ग्रहण करने में सक्षम बनता है जहाँ वर्तमान में उसकी ग्राह्यता नहीं है ।
इसलिये आध्यात्मिक सत्य की खोज़ को वैज्ञानिक सत्य की खोज़ के क्रममें आगे की खोज़ के
रूप में ग्रहण किया जाना योग्य विचार है । विज्ञान मस्तिष्क को क्रमिक प्रगति के
पथपर अग्रसर करता है । परम् सत्य का वास्तविक अनुभव पाने के लिये सुझाये हये पथ
नामत: ज्ञानपथ कर्मपथ भक्तिपथ भी आत्मा का क्रमिक विकास करते हुये ज्ञान के
वास्तविक अनुभव तक पहुँचने का अवसर प्रदान करते हैं । आत्मा प्रकृतीय मोंह के
आच्छादन के प्रभाव से अज्ञान के अंधकार से ग्रसित होता है । उसे ज्ञान के सूर्य के
प्रकाश तक क्रमबद्ध प्रगति द्वारा ही पहुँचाया जा सकता है । आध्यात्मिक दृष्टि का
विकसित होना भी उतना ही आवश्यक होता है ।
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