गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

अविद्या आध्यात्मिक अंधता

अविद्या कोई मानसिक स्तर की त्रुटि नहीं होती । अविद्या आध्यात्मिक अंधता है । अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य के अंश आत्मा की अनुभूति का ना होना । परम् सत्य की चिर दिव्य आनंदमय स्वरूप की अनुभूति ही मनुष्य का वास्तविक परिचय होता है । इस अनुभूति के प्रभाव से ही उसके चरित्र में समस्त सुंदर गुण प्रगट होते हैं । इस अनुभूति के क्षीण होने की दशा में मनुष्य में प्रगट होती है अविद्या । अविद्या के प्रगट होने पर सृजित होती हैं इच्छायें । इच्छाओं के उत्पन्न होने पर वह करता है फल की कामना से कार्य । इस प्रकार दो अलग अलग चक्र प्रवृत्त होते हैं । दोनों ही चक्र मनुष्य ही सम्पादित करता है । एक चक्र बंधनकारी  होता है । दूसरा मुक्तिदायक होता है । यह अंतर उत्पन्न होता है अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य के अंश आत्मा की अनुभूति करते हुये जीवनजीने में अथवा आत्मा की उपस्थिति से अचेत जीवनयापन करने में ।
धर्मदर्शन अनुशंसा करता है कि अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य के अंश की अनुभूति करते हुये, उस परम् सत्य की गरिमा के अनुसार जीवन जीने हेतु । दशा जिसमें मनुष्य इस अनुभूति को नहीं अनुभव कर पाता है अविद्या कहा गया । यह अंधता उसे प्रवृत्त करती है भ्रमात्मक प्रकृतीय मोंह की ओर । यह प्रकृतीय मोंह उसे दु:खभोग के दुश्चक्र में डालता है ।

योगशास्त्र बताता है वह विधायें जिनके द्वारा अविद्या का नाश होता है । वह विधायें जिनके द्वारा मनुष्य को प्रतिपल स्मरण बना रहता है उस परम् सत्य की अपने अंत:करण में उपस्थित होने की । ऐसी दशा में ही मनुष्य परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप जीवनजीता है । परम् सत्य की उपस्थिति प्रत्येक प्राणी में अनुभव करता है । शाश्वत परम् सत्य की निरंकार छवि के अनुरूप जीवनजीता है । परम् सत्य अपने को ऐसे ही मनुष्यों के जीवन में प्रगट करता है । 

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