अविद्या कोई मानसिक स्तर की त्रुटि नहीं होती । अविद्या
आध्यात्मिक अंधता है । अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य के अंश आत्मा की अनुभूति का
ना होना । परम् सत्य की चिर दिव्य आनंदमय स्वरूप की अनुभूति ही मनुष्य का वास्तविक
परिचय होता है । इस अनुभूति के प्रभाव से ही उसके चरित्र में समस्त सुंदर गुण
प्रगट होते हैं । इस अनुभूति के क्षीण होने की दशा में मनुष्य में प्रगट होती है
अविद्या । अविद्या के प्रगट होने पर सृजित होती हैं इच्छायें । इच्छाओं के उत्पन्न
होने पर वह करता है फल की कामना से कार्य । इस प्रकार दो अलग अलग चक्र प्रवृत्त
होते हैं । दोनों ही चक्र मनुष्य ही सम्पादित करता है । एक चक्र बंधनकारी होता है । दूसरा मुक्तिदायक होता है । यह अंतर
उत्पन्न होता है अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य के अंश आत्मा की अनुभूति करते हुये
जीवनजीने में अथवा आत्मा की उपस्थिति से अचेत जीवनयापन करने में ।
धर्मदर्शन अनुशंसा करता है कि अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य
के अंश की अनुभूति करते हुये, उस परम् सत्य की
गरिमा के अनुसार जीवन जीने हेतु । दशा जिसमें मनुष्य इस अनुभूति को नहीं अनुभव कर
पाता है अविद्या कहा गया । यह अंधता उसे प्रवृत्त करती है भ्रमात्मक प्रकृतीय मोंह
की ओर । यह प्रकृतीय मोंह उसे दु:खभोग के दुश्चक्र में डालता है ।
योगशास्त्र बताता है वह विधायें जिनके द्वारा अविद्या का
नाश होता है । वह विधायें जिनके द्वारा मनुष्य को प्रतिपल स्मरण बना रहता है उस
परम् सत्य की अपने अंत:करण में उपस्थित होने की । ऐसी दशा में ही मनुष्य परम् सत्य
की गरिमा के अनुरूप जीवनजीता है । परम् सत्य की उपस्थिति प्रत्येक प्राणी में
अनुभव करता है । शाश्वत परम् सत्य की निरंकार छवि के अनुरूप जीवनजीता है । परम्
सत्य अपने को ऐसे ही मनुष्यों के जीवन में प्रगट करता है ।
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