सोमवार, 21 अप्रैल 2014

मनुष्य की पूर्णता

हमारे अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया प्रकृतीय मोंह के वशीभूत हमें आभाव का अनुभव कराती है । आभाव की अनुभूति समस्त मानवीय सुखों का नाश करने वाली होती है । हम सभी के मस्तिष्क में दोनों ही प्रकार के विचार विद्यमान रहते हैं । पहले वह विचार जो हमें उत्थान की ओर ले जाते है । परम् सत्य की चिर दिव्य शांति की ओर । दूसरे वह विचार जो प्रकृतीय मोंह की वृद्धि करने में सहायक होते हैं । इस प्रकृति निर्मित शरीर में प्रकृति के विज्ञान के प्रभाव द्वारा उपरोक्त दोनों ही प्रकार के विचार मस्तिष्क में रहते है । यह निर्भर करता है मनुष्य के सचेष्ट प्रयत्नों पर कि वह अपने अंदर विद्यमान उत्थानकारक प्रवृत्तियों को विकसित करने के लिये आवश्यक उपाय करें ।
जब तक मस्तिष्क उपरोक्त दोनों ही विचारों के प्रभाव में रहता है । उसका विवेक अपने उत्थान के लिये दृढता से संलग्न होने को कटिबद्ध नहीं रहता है । तब तक वह भ्रमात्मक स्थितियों को झेलता है ।

जब वह अपने उत्थान के लिये कटिबद्ध हो जाता है । योगशास्त्र के द्वारा सुझाये पथों का अनुसरण कर जीवनयापन करने लगता है । ऐसी दशा में निश्चय ही उसे मनुष्य शरीर में रहते ही पूर्णता की स्थिति प्राप्त होती है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें