मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

दिव्य रूप

परम् सत्य को पाने के लिये जो साधक जिस मार्ग से प्रयत्नशील होता है उसे उसी की साधना के अनुरूप रूप में परम् सत्य उसे मिलता है । ज्ञान के रूप में पाने के प्रयत्नशील साधक को परम् सत्य चमकते हुये सूर्य के रूप में उज्ज्वल ज्ञान के स्वरूप में मिलता है जिसमें अंधकार का कंचिद कोई रंचमात्र स्थान नहीं होता है । जो साधक उस परम् सत्य को सत् कर्मों के द्वारा पाने को प्रयत्नशील होता है उसे वह परम् सत्य शाश्वत् दृढ समदर्शी पवित्रता के रूप में मिलता है । जो भावुक साधक उस परम् सत्य को प्रेम व भक्ति के पथ से पाने को प्रयत्नशील होता है उसे वह प्रेम व करुणा की शाश्वत् कोमलता के रूप में मिलता है । इस प्रकार परम् सत्य अपने में इन विभिन्न स्वरूपों को संजोये हुये है । साधक को उसके समंवित स्वरूप में उसे पाने के लिये लक्ष्य करना होता है । धारणा इच्छा और विचार ये तीन मानसिक अवस्थायें हैं जिनका व्यवहारिक जीवन में अलग अलग रूप नहीं कायम किया जा सकता है । यह तीनों ही एक ही सत्य की तीन अवस्थाये हैं । 

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