अविद्या से मुक्ति पाने के लिये परम सत्य की जो छवि प्रकृति
के मध्यरहकर प्रकृतीय मोंह से आच्छादित हो गई है उसे स्वच्छ करना होगा । परम् सत्य
की चेतना की स्थिर ज्योति जगानी होगी । मस्तिष्क की अस्थिरता, सतत् परिवर्तित होती धारणाओं पर विजय करना होगा । मस्तिष्क के अंदर जो द्वंद
प्रकृतीय मोंह तथा परम् सत्य की चेतना के मध्य चलरहा होता हैं उसपर पूर्ण अंकुश
करना होगा और मस्तिष्क को परम् सत्य की चेतना में स्थिर करना होगा ।
इंद्रीय गुणों के भोग की वासना को अंकुश करना होगा । मस्तिष्क में उठने वाले
इच्छाओं के वेग को नियंत्रित करना होगा । समस्त विकार मस्तिष्क में ही जन्म लेते
हैं । इसीलिये सर्वाधिक सुधार मस्तिष्क की ही दशा सुधार में ही अपेक्षित होते हैं
। मस्तिष्क में तर्कों द्वारा उत्पन्न होने वाली अस्थिरता को पूर्णरूप से विश्वास
द्वारा विजित करना होगा । विवेक को परम् सत्य के प्रति निष्ठावान बनाना होगा ।
परम् सत्य हमारे अंदर विद्यमान होते हुये भी अविद्या के
आच्छादन के कारण लुप्त दशा को प्राप्त होता है । आच्छादन समाप्त होने पर परम् सत्य
की चेतना की ज्योति हमारे व्यक्तित्व को प्रकाशित करेगी । हम प्रकृतीय मोंह की जेल
से मुक्त होकर दिव्य आनंद के व्यापक व्यक्तित्व की अनुभूति करेगें । परम् सत्य की
सतत् अनुभूति ही ज्ञान है । ज्ञान का सूर्य उदय होने पर अविद्या का अंधकार विलीन
हो जावेगा । लिप्सा व मोंह विनष्ट होगा ।
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