मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

परिवर्तन से परे

परम् सत्य पूर्णरूप से अपरिवर्तनशील है । इस अपरिवर्तनशील की रचना परिवर्तनों से युक्त होती है । इस परिवर्तनशील संसार में जो कुछ भी परिवर्तन हो रहे हैं वह कर्मों के प्रभाव से हैं । कर्मों की प्रेरणा हम ग्रहण कर रहें हैं इच्छाओं से । यह इच्छायें ही अज्ञान का स्वरूप हैं । सत्य का ज्ञान ना होना ही अज्ञान है ।
अपरिवर्तनशील को परिवर्तन से युक्त द्वारा नहीं जाना जा सकता है । ज्ञान को अज्ञान के माध्यम से नहीं जाना जा सकता है । अपरिवर्तनशील ही एकमात्र सत्य है । यही एकमात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । परिवर्तनशील असत्य है । परिवर्तन का होना ही उसकी असत्यता का प्रमाण है ।
समस्त परिवर्तनों का मूल कर्म होता है । कर्म के द्वारा ही परिवर्तन सम्भव होते हैं । कर्मों की गुणवत्ता ही बंधन या मुक्ति हैं । कर्मों की गुनवत्ता निर्भर करती है उसके प्रेरणाश्रोत पर । प्रेरणाश्रोत जबतक अज्ञान पर लम्बित होगा मुक्ति सम्भव नहीं होगी । अज्ञान अर्थात सत्य से परे| 
कर्मों का प्रेरक परम् सत्य है । कर्मों की कर्ता असत्य है । यह सत्य का स्वरूप है । ज्ञान है । इसके विपरीत भ्रम है । भ्रम ही अज्ञान का स्वरूप है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें