रविवार, 20 अप्रैल 2014

गीता में योगा

श्रीमद् भागवद्गीता में सम्पूर्ण योगशास्त्र दिया गया है । योगशास्त्र जो कि पूर्ण विस्तार से है, लचीला है, और आत्मा को क्रमबद्ध चरणों में प्रकृतीय मोंह से मुक्त करने वाला है । स्मरणीय है कि आत्मा अपने शुद्ध मौलिक स्वरूप में अर्थात् ब्रम्ह की मर्यादा के अनुकूल स्वरूप में प्रकृतीय गुणों से अछूता होता है । परंतु प्रकृति के मध्य रहते प्रकृतीय गुणों का भोग करते वह प्रकृतीय मोंह का कलंक ओढ लेता है । यही वह स्थिति होती है जिसका भान होने पर वह महसूस करता है कि हम परमात्मा से बिछुड गये हैं । खोयी हुई ब्रम्ह की मर्यादित छवि को फिर से पाने के लिये, ओढी हुई प्रकृतीय मोंह का नाश करने के लिये उसे अपने सम्पूर्ण पुनर्निर्माण की आवश्यकता होती है । यह अवसर श्रीमद् भागवद गीता में वर्णित योग-शास्त्र अति सुगमता से प्रदान करता है । यह योगशास्त्र मनुष्य के अंत:करण के पुनर्निर्माण के लिये एक पूर्ण संकलित एकीकृत ज्ञान है जो कि उसे प्रकृतीय मोंह के जेल से मुक्त कराके उसे एक व्यापक सुहृद प्रेममय व्यक्तित्व के रूप में पर्णित करने वाला है । एक ऐसा व्यक्तित्व जिसमें जीवन जीने के मूल्य ही बदल जाते हैं । जीवन दु:ख और कलह से मुक्त हो शांत दिव्य आनंद की स्थिति भोग करता है । इस योगशास्त्र की प्रत्येक विधा से सम्बंधित अनुशंसा योगा कही जाती हैं । 

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