भारतीय धर्मदर्शन इस सृष्टि के परम् सत्य का परिचय कराता है
। प्रारम्भिक अवस्था में यह परिचय मात्र बौद्धिक स्तर तक होता है । परंतु यह परिचय
उसके अपने जीवन के सत्य अनुभव तक कराना उसका लक्ष्य होता है ।
इस सम्बंध में यह कवायद की जाती है कि मनुष्य उस परम् सत्य
का ही अंश होता है । इसे सत्य माने जाने की दशा में मात्र मनुष्य को उसके अपने
वास्तविक स्वरूप के बोध को जाग्रित करना ही परम् सत्य को जान लेने के समान होगा ।
दूसरी कवायद यह की जाती है कि मनुष्य यह महसूस करता है कि वह परम् सत्य से बिछुड
गया है । इसे सत्य माने जाने की दशा में उसे एक ऐसी विधा को जानने की आवश्यकता
होती है कि वह प्रति पल यह स्मरण रख सके कि वह उस परम् सत्य का ही अंश है और इसके
अतिरिक्त कोई विचार मात्र भ्रम है ।
श्रीमद् भागवद् गीता में इस सृष्टि के परम् सत्य का ज्ञान
और उस परम् सत्य का सत्य अनुभव पाने की क्रिया विधि दोनों ही वर्णित है । इसलिये
वर्तमान प्रकरण योगशास्त्र को विस्तार पूर्वक जानने के लिये श्रीमद् भागवद् गीता
के अंश उद्घृत किये जाते रहेंगे । ज्ञातव्य है कि श्रीमद् भागवद् गीता पुराणों की
श्रेंणी का ग्रंथ है जिसे ब्रम्ह विद्या व उस ब्रम्ह को अपने द्वारा इस जीवन के
अनुभव के रूप में पाने की सम्पूर्ण विधि के वर्णन को प्रमाणिक माना गया है ।
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