परम् सत्य को बताया गया है सत् चित आनंद । सत् – वास्तविक । चित – सत्य । आनंद – आनंदमय । ब्रम्ह
का अनुभव प्राप्त होगा जो कि वास्तविक अनुभव होगा । इसके विपरीत होता है भ्रामक
अनुभव । जो कि प्रतीत होता है परंतु वास्तविकता में उस स्वरूप में होता नहीं है ।
प्रकृतीय मोंह से मिलने वाला सुख । यह सत् नहीं होता । प्रारम्भ में प्रतीत होता
है कि यह सुख है । परंतु अंत में वह दु:ख का कारण बनता है । इसके विपरीत ब्रम्ह के
दर्शन से मिलने वाला सुख वास्तविक सुख होता है । समय के व्यतीत होने परभी वह सुख
ही रहेगा । परम् सत्य को लक्ष्य कर प्रयत्नशील जिज्ञासुओं के सज्ञान के लिये यह
लक्षण बताये गये हैं । इन लक्षणों से तुलना करके प्रयत्नशील साधक को अपने
प्रयत्नों की सार्थकता को परीक्षित करना होगा । परम् सत्य का जो अनुभव प्राप्त होगा
वह वास्तविक अनुभव होगा, समय के साथ
परिवर्तित होने वाला नहीं होगा, और प्रत्येक रूप
में वह आनंदमय होगा ।
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