रविवार, 27 अप्रैल 2014

पूर्णता का लक्ष्य

जीवन में पूर्णता का लक्ष्य । मनुष्य में विद्यमान परम् सत्य की छाया का दर्शन । परम् सत्य की गरिमा के अनुकूल आचरण । आच्छादित अविद्या का शमन यह सभी एक ही स्थिति को अलग अलग ढंग से व्यक्त करना है । इस स्थिति को पाने के तीन मार्ग बताये जाते हैं । प्रथम परम् सत्य के ज्ञान द्वारा । द्वितीय परम् सत्य व उसकी रचना प्रकृति के प्रति प्रेम व समर्पण द्वारा । तीसरा अपनी समस्त इच्छाओं को प्रभु के प्रयोजन के लिये अर्पित करने के द्वारा । वास्तविकता में उपरोक्त तीनो विभाजन मनुष्य में पायी जाने वाली तीन भिन्न प्रकार की प्रकृति के अनुरूप सुझाया गया है । यथा सैद्धांतिक ग्राह्यता जिनकी प्रधान पहचान है उनके लिये ज्ञान-पथ सुगम बताया गया । जिनमें भावुकता प्रधान पहचान है उनके लिये भक्ति अर्थात प्रेम व समर्पण का पथ सुगम बताया गया । जिनमें व्यवहारिक कर्म जगत की प्रचलित मान्यताये प्रधान पहचान है उनके लिये कर्म पथ को सुगम बताया गया है । लक्ष्य एक ही होता है । अविद्या का नाश । फलत: जाग्रित होने वाला ज्ञान । इस ज्ञान की ज्योति से विकसित होने वाला व्यापक व्यक्तित्व । शांत दिव्य ब्रम्ह की गरिमा का जीवन । 

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