अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया का सीधा सक्षात्
अनुभव पाने के लिये मात्र बाधक प्रवृत्तियों को हटाने की आवश्यकता है । अविद्या के
आच्छादन को हटाने मात्र से अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया का दर्शन मिलेगा
। इसके लिये किसी नयी तलाश की आवश्यकता नहीं होती । अद्वैत वेदांत व्यक्त करता है
कि यह परम् सत्य हमारे अंदर सदैव विद्यमान रहता है । इसे कहीं तलाशना नहीं है ।
मात्र हमारी अस्थिर धारणायें और हमारी इच्छायें इस परम् सत्य को आच्छादित किये
हुये रहती हैं । परिणामत: हम इस परम् सत्य के दर्शन से च्युत रहते हैं । मस्तिष्क
की पूर्ण शांति की स्थिति और इच्छाओं का पूर्णदमन तथा अहंकार का पूर्ण मर्दन होने
पर परम् सत्य के साक्षात् दर्शन अविलम्ब होंगे । यह वह प्रकाश श्रोत है जिससे हमारे
जीवन का वास्तविक स्वरूप प्रगट होगा । इस प्रकाश पुँज से जीवन का वह दिव्य स्वरूप
प्रगट होगा जो स्नेह व सौहार्द का प्रतीक होगा ।
परम् सत्य के दर्शन और अविद्या के आच्छादन के परिणाम से
व्याप्त अज्ञान दोनों एक दूसरे के विरोधी प्रकाश और अंधकार की भाँति होते हैं ।
परम्ब सत्य के दर्शन से ज्ञान का सूर्य उदय होगा और अज्ञान का अंधकार पूर्णरूप से
विलीन हो जायेगा । अविद्या से आच्छादित आत्मा पूर्णरूप से मुक्त हो जायेगी । मुक्त
आत्मा पूरे भ्रमलोक पर विजय कर लेगी । इस विजय के लिये किसी युद्ध को नहीं लडना है
। इसके लिये किसी बाह्य शक्ति का शमन या किसी नयी उत्पत्ति का निर्माण नहीं करना
है । ऐसी स्थिति मिलजाने पर कर्म बंधनकारी नहीं रह जावेंगे । जब हम इस सत्य के
दर्शन पायेगे तो हमारा जीवन ही ब्रम्ह के जीवन के स्वरूप हो जावेगा । यही जीवन का
आदर्श स्वरूप होगा ।
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