अविद्या वस्तु की सत्य प्रकृति के प्रति अनभिज्ञता को कहा
जाता है । एक भ्रांतिपूर्ण धारणा कि मनुष्य आत्मनिर्भर है । मनुष्य वास्तविकता है
और स्थायी है कि भूलपूर्ण धारणा अविद्या है । यह अविद्या जन्म देती है इच्छाओं को
। इच्छाओं का पीछा करते हुये मनुष्य सदैव इस संसार में आवागमनके चक्र में चलता ही
रहेगा । इससे कभी भी मुक्ति नहीं पा सकेगा । इच्छाओं का पीछा करते हुये चाहे वह
सत्कर्म पुण्य दान करे अथवा तामस की पूर्ति करे दोनों ही बंधनकारी हैं ।
सत्य स्थिति का बोध होना ज्ञान है । ज्ञान अविद्या का नाश
करने वाला होता है । अविद्या समाप्त होने पर इच्छाये विश्राम पाती हैं । इच्छाओं
से मुक्त होने पर कर्म दोष समाप्त होते हैं । इच्छाओं का निदान अधिक इच्छाओं द्वारा
नहीं किया जा सकता । कर्म दोष का निवारण और अधिक दोषपूर्ण कर्मद्वारा नहीं किया जा
सकता है । शाश्वत् सत्य को परिवर्तनशील अस्तित्व द्वारा नहीं पाया जा सकता ।
अविद्या का नाश होने पर ही इच्छाओं से मुक्ति मिलेगी ।
इच्छाओं का नाश होने पर ही फल की कामना से किये जाने वाले कर्म से मुक्ति मिलेगी ।
विद्या ही उपाय है अविद्या से मुक्ति का – इच्छा – कर्म फल की कामना से किये जाने वाले कर्म का । बंधन से मुक्ति का ।
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